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Sunday, 1 September 2013

... मन ...



वीरान हे कहि
अन्जान हे कहि 
जाने क्यू ये समंदर सा मन 
आज सुनसान हे कहि ….

 कितने ही राज़ हे गहरे 
जिनका कोई हमराज़ नहीं
कितने ही सपने हे सुनहरे 
जिनका कोई आकर नहीं….

मन का मौसम 
तो जेसे पतझड़ ही हे
देखा करे आकाश में
 उम्मीदों से
जाने किस पल 
छलक जाये रंगों की बूँद।।

वर्षा हो खुशियों की
 और ज़िन्दगी फिर हरियाली हो जाए.…. 

~ नूपुर ~ 

8 comments:

  1. bahut hi pyara :)
    ye panktiyaan tuo chuu gyi jaise
    वीरान हे कहि
    अन्जान हे कहि
    जाने क्यू ये समंदर सा मन
    आज सुनसान हे कहि ….

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    Replies
    1. Thanx a lot aarohi for steping in my world for the first time :)

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  2. wow..

    they Say.
    Man bada chanchal hai.
    it keeps hopping from one place to another :)

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  3. नूपुर : खूबसूरत और नाजुक. रंगीन बूंदों की कल्पना आह्लादित कर गयी :)

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  4. Dhanyawaad raju ji...
    M happy that u stepped in here :)

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