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Wednesday, 7 November 2012

एक नयी सुबह

एक रिवाज़
एक दस्तूर
एक प्रथा ... से जादा और कुछ नहीं//

कभी मजबूर
कभी लाचार
कभी अंधियारों में भटकती मूरत ... से जादा और कुछ नहीं//

बंद दरवाज़े
ख़ामोशी
अधूरेपन ... से जादा और कुछ नहीं//



कब दस्तक देगी वो आहात एक बदलाव की,
एक हसी जो बस यादों में केद हे ... कब फिर सुनाई देगी
कब हटेंगे ये बादल आसुओं के
कब खुशियों की घटा फिर छाएगी ...

मज़बूरी की आड़ में खुद को बांधे रखना सही नहीं
ज़रूरत हे आत्म विश्वास से भरे एक बदलाव की
क्या पता वो एक कदम , एक हजारो की प्रेरणा बन जाये
और हर आँगन दीपक से जगमगाए ...

 दर्द जब खुदका हे तो आवाज़ तो उठानी ही पड़ेगी
कही एसा न हो, एक मसीहे की राह देखते - देखते ... ज़िन्दगी ही थम जाये।।।



~नूपुर~

14 comments:

  1. मर्म को छु जाने वाली रचना।

    सादर

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  2. बहुत सुन्दर और सार्थक अभिव्यक्ति...

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  3. Another beautiful poem from your pen ... lovely !!!

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  4. very nice poem n so much motivational..

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  5. Messiah is also one somewhere amongst us .. so why not OURSELF..

    loved the last two lines , beautiful

    Bikram's

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    1. Yeah, you are absolutely right...
      Thanx for loving those two lines :)

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  6. Nyc poem.. U put it well keep writing

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  7. beautifully pen down.. alwaya love reading hindi poems.. loved it :) :)

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    1. If you love them... then you can find many here of your interest....

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