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Friday, 18 May 2012

/// मेरा मन ///

सोच रही हू बह जा एक झरने की तरह,या फिर इस मे ठहर जा??
क्या कोई रास्ता है इससे निकल जाने का,,और ख़ुद मे एक बदलाव लाने का??
एक पल सोच भी लू अगर तो क्या अंतर पड़ता है??
क्या बदला है कल और आज मे. . .??
जिन पर विश्वास किया था चेहरों के अलावा और कुछ भी नहीं!!!! 

कभी ख़ुद मे महसूस किया था,,और कभी ख़ुद ही का सामना करना पड़ा था///
फिर भी साथ दिया हमेशा,,
ये सोच कर की मेरे अपने है..........

पर क्या सच मे फर्क पड़ता है किसी को,, 
या जरूरत के हिसाब से रिश्ते भी बदल जाया करते हैं??

मुझे पता है यालो का, सवालों का कोई जवाब नहीं जो बेवक्त ही मेरे में चले आते है...
पर क्यूं हर बार ही मुझे स्थिर सा कर जाते है!!

क्या हक़ है मुझे ख़ुद पर सवाल उठाने का और नुकसान पहुंचाने का......

क्योंकि मेने तो कभी ख़ुद  का साथ दिया ही नहीं था...
मे तो जाने अनजाने उन ही का साथ दिया करती थी,,मूर्ख हू मैं जो उन्हें अपना कहा करती थी!!




क्या दिखाई नहीं  देता,या फिर इनसान मोह में इतना अंधा हो जाता है!! 
माना मैं नहीं देख पाईं,, नकली चेहरे लेकिन क्या भगवान ने भी नहीं देखा होगा??

कमी ख़ुद मे हो तो कोई क्या कर सकता है??
कोई तो कोई जले पर नमक ही लगा सकता  है!! 

कई बार मेरा दिल करता है की कह जा सब कुछ....

मैंने सुना है अक्सर की वक्त के साथ हर घाव भर जाते है...
पर कोई क्यों नहीं कहता की वक्त के साथ घाव गहरे भी हो जाया करते है!! 
कभी लगता है एक पूर्ण विराम लगा दु,,
ख़ुद पर///
पर तब तक कोई कोई फिर अपना बन के चला आता है...

वही नकाब..

वही दर्द...

बस बदल जाति है सूरत,,और मेरे को दुख देने के तरीके...
न जाने कब समझ पागी में, दुनिया की रीत को,,
जहाँ मतलब के अलावा और कुछ जरूरी  नही हुआ करता///
क्योंकि बिना किसी कारण,,कोई किसी को अपना नहीं कहा करता..........///

~नूपुर~

16 comments:

  1. सच तो यह है कि हम सभी के असली चेहरे एक मुखौटे के भीतर छुपे हुए हैं। भगवान ए तो सबको बनाया है उसे तो सब पता है लेकिन हम ही खुद को भूल कर छद्म आवरण मे जी रहे हैं।
    खुद पर पूर्ण विराम लगाने की सोचने से अच्छा खुद से खुद की दोस्ती को मजबूत करने के बारे मे सोचना चाहिये क्योंकि क्योंकि गैरों के बीच हम खुद ही खुद के अपने हैं।

    सादर

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  2. Dhanyawad yashwant ji... Mujhe itna aacha udahran dene k liye...

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  3. very nice noopur..............
    well expressed thoughts.............

    bless u.
    anu

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  4. ये सच है कि वक़्त कुछ घाव गहरे कर देता है....दुःख भी भेष बदल कर आते रहते हैं....हम उहा-पोह कि स्थिति में खुद पे पूर्ण विराम लगाने कि सोचने लगते है....परन्तु यही जीवन है...हमे स्वीकारना होगा इसे...और हँसते हुए..बिना किसी गिला के...हम अपना बेहतर देंगे...हमे नहीं मिला तो क्या हुआ?
    रचना काफी सवाल समेटे है और गहन है...आभार...

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  5. @Swati Vallabha Raj
    Thank you for visiting my blog and the comment :)

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  6. कल 20/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. @yashwant ji...
    Mujhe shamil karne k liye dhanyawad....

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  8. @Dr.NISHA MAHARANA
    Thnx :)

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  9. ppl now-a-days wear multiple faces ..
    Home Face, Office Face, Party face ...
    we only need to identify their multiple identities and the best we can do is Just Stay away frm them.
    But some are very simple and are same always, we call them buddies for ever , bestst frnds

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  10. @jayesh...
    s ur for me...my bst buddy :)

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  11. @अमित श्रीवास्तव
    Dhanyawad... :)

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